विवाहविच्छेद
हिन्दु परम्परा में विवाह Marriage अथवा निकाह् (शादी) का समानार्थी न होकर मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों में वर्णित १६ संस्कारों में से एक संस्कार है। धर्मशास्त्रों में संस्कारों की व्याख्या करते हुए कहा गया है ‘संस्कार वह है जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के लिये योग्य हो जाता है’- शबर, ‘संस्कार वे क्रियाएं तथा रीतियां है जो योग्यता प्रदान करती हैं’- तन्त्रवार्तिक। मनुस्मृति (२/२७-२८) में कहा गया कि माता-पिता के वीर्य एवम् गर्भाशय के दोषों को गर्भाधान-समय के होम तथा जातकर्म से, चौल (मुण्डन संस्कार) से तथा उपनयन से दूर किया जाता है। याज्ञवल्क्य (१/१३) का मत है कि संस्कार से बीज-गर्भ के दोष मिट जाते हैं। इसी प्रकार विवाह संस्कार का महत्व दो व्यक्तिओं को आत्मनिग्रह, आत्म-त्याग एवं परस्पर सहयोग की भूमि पर चलते जाते देना है। जहां क्रिया की दृष्टि से विवाह Marriage अथवा निकाह से भिन्न है, वहीं सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से भी यह एक धार्मिक कृत्य होने से अभ्युदय की प्राप्ति में सहायक है। हिन्दु जीवन संस्कारों से उत्तरोत्तर श्रेष्ठता को प्राप्त होता है तथा यही मानव जीवन का उद्देश्य भी है।
Marriage का अर्थ विधि द्वारा मान्य स्त्री-पुरुष के मध्य वह संबंध है, जिससे वह दोनों पत्नी-पति के रूप में परिणित हो जाते हैं। यहां Marriage का न तो कोई विशेष उद्देश्य है, न ही संस्कार की भांति इसमें पति पत्नी को Marriage के योग्य बनाने के लिये कोई क्रियायें। इसके साथ Marriage में कोई समर्पण भाव भी नहीं है, वचन भी नहीं। इसीलिये Marriage के साथ Divorce को भी उसी प्रकार मान्यता प्राप्त है जिस प्रकार Marriage को। इसी प्रकार इस्लाम में निकाह के समय ही पति को कुछ आश्वासनों के साथ भविष्य में विच्छेद (तलाक़) की छूट दी जाती है। यहां तो पति (शौहर) अपनी पत्नी (बीवी) को केवल तीन बार तलाक़ का उच्चारण कर इस संबन्ध से मुक्ति पा सकता है।
हिन्दु विवाह पद्धति का एक विभेधक व धवल पक्ष यह भी है कि इसमें कहीं भी विच्छेद जैसा कोई प्रावधान नहीं है, यही कारण है कि हमारे यहां तलाक़ अथवा Divorce जैसा कोई शब्द ही नहीं है। यद्यपि वैदिक साहित्य में कुछ ऐसी उक्तियां हैं जिन्हें हम विधवा-पुनर्विवाह के अर्थ में ले सकते है, इसके लिये ‘पुनर्भू’ शब्द के माध्यम से पर्याप्त प्रकाश मिलता है किन्तु विवाह-विच्छेद के विषय में कुछ भी प्राप्य नहीं है तथा पौराणिक अथवा धर्मसूत्रों आदि में इसके कोई उदाहरण भी उपलब्ध नहीं हैं। धर्मशास्त्रकारों का सिद्धान्त है कि होम एवं सप्तपदी के उपरान्त विवाह का विच्छेद नहीं हो सकता। मनु (९/१०१) ने लिखा है- "पति-पत्नी की पारस्परिक निष्ठा आमरण चलती जाये, यही पति एवं पत्नी का परम धर्म है।" एक और स्थान पर (९/४६) पर मनु ने कहा है- "न तो विक्रय से और न भाग जाने से पत्नी का पति से छुटकारा हो सकता है।" धर्मशास्त्रकारों का कथन है कि विवाह एक संस्कार है, पत्नीत्व की स्थिति का उद्भव उसी संस्कार से होता है, यदि पति या पत्नी पतित हो जाये तो संस्कार की परिसमाप्ति नहीं होती, यदि पत्नी व्यभिचारिणी हो जाये तो भी वह पत्नी है, और प्रायश्चित कर लेने के उपरान्त उसे विवाह का संस्कार पुन: नहीं करना पड़ता। (याज्ञवल्क्य ३/२५३-२५४)। अत: विवाह-विच्छेद की बात धर्मशास्त्रों एवं हिन्दु समाज में अनकही-अनसुनी सी रही है। स्मृतियों एवं निबन्धों में नारद को छोड़कर पत्नी के द्वारा पति के त्याग की बात नहीं कही गयी है। नारद ने कहा है कि नपुंसक, संन्यासी एवं जातिच्युत पति को पत्नी छोड़ सकती है।
स्त्री प्रशंसा-स्त्रियों के संबन्ध में हमारे ऋषियों ने बहुत आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में कहा है- “ स्त्रियों पर ही धर्म एवं अर्थ आश्रित हैं उन्हीं से पुरुष इन्द्रियसुख प्राप्त करते है, ये घर की लक्ष्मी हैं, इनको सदैव सम्मान देना चाहिये”। वराहमिहिर स्त्रीनिन्दकों से पूछते हैं- “ सच बताओ, स्त्रियों में कौनसे दोष हैं जो तुम लोगों में नहीं पाये जाते? पुरुष लोग धृष्टता से स्त्रियों की भर्त्सना करते हैं, वास्तव में स्त्रियॉं पुरुषों की अपेक्षा अधिक गुणों से सम्पन्न होती हैं ” मनु के वचनों को अपने समर्थन में उद्धृत करते हुए वराहमिहिर कहते हैं- “ अपनी मॉं या पत्नी भी स्त्री ही है, पुरुषों की उत्पत्ति उन्हीं से होती है; अरे कृतघ्नी एवं दुष्ट, तुम जब इस प्रकार उनकी भर्त्सना करते हो तो तुम्हें सुख क्योंकर मिलेगा? शास्त्रों के अनुसार दोनो पति-पत्नी पापी हैं यदि वे विवाह के प्रति सच्चे नही, पुरुष लोग शास्त्रों की बहुत कम परवाह करते हैं, किन्तु स्त्रियां बहुत परवाह करती है, अत: स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। अकेले में पुरुष स्त्री की चाटुकारिता करते हैं, किन्तु उनके मर जाने पर उनके पास सहानुभूति के शब्द नहीं होते; किन्तु स्त्रियां कृतज्ञता के वश में आकर अपने पति के शवों का आलिंगन करके अग्नि तक में प्रवेश कर जाती हैं।’
Saturday, July 19, 2008
विवाहविच्छेद
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