Saturday, July 19, 2008
विवाहविच्छेद
विवाहविच्छेद
हिन्दु परम्परा में विवाह Marriage अथवा निकाह् (शादी) का समानार्थी न होकर मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों में वर्णित १६ संस्कारों में से एक संस्कार है। धर्मशास्त्रों में संस्कारों की व्याख्या करते हुए कहा गया है ‘संस्कार वह है जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के लिये योग्य हो जाता है’- शबर, ‘संस्कार वे क्रियाएं तथा रीतियां है जो योग्यता प्रदान करती हैं’- तन्त्रवार्तिक। मनुस्मृति (२/२७-२८) में कहा गया कि माता-पिता के वीर्य एवम् गर्भाशय के दोषों को गर्भाधान-समय के होम तथा जातकर्म से, चौल (मुण्डन संस्कार) से तथा उपनयन से दूर किया जाता है। याज्ञवल्क्य (१/१३) का मत है कि संस्कार से बीज-गर्भ के दोष मिट जाते हैं। इसी प्रकार विवाह संस्कार का महत्व दो व्यक्तिओं को आत्मनिग्रह, आत्म-त्याग एवं परस्पर सहयोग की भूमि पर चलते जाते देना है। जहां क्रिया की दृष्टि से विवाह Marriage अथवा निकाह से भिन्न है, वहीं सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से भी यह एक धार्मिक कृत्य होने से अभ्युदय की प्राप्ति में सहायक है। हिन्दु जीवन संस्कारों से उत्तरोत्तर श्रेष्ठता को प्राप्त होता है तथा यही मानव जीवन का उद्देश्य भी है।
Marriage का अर्थ विधि द्वारा मान्य स्त्री-पुरुष के मध्य वह संबंध है, जिससे वह दोनों पत्नी-पति के रूप में परिणित हो जाते हैं। यहां Marriage का न तो कोई विशेष उद्देश्य है, न ही संस्कार की भांति इसमें पति पत्नी को Marriage के योग्य बनाने के लिये कोई क्रियायें। इसके साथ Marriage में कोई समर्पण भाव भी नहीं है, वचन भी नहीं। इसीलिये Marriage के साथ Divorce को भी उसी प्रकार मान्यता प्राप्त है जिस प्रकार Marriage को। इसी प्रकार इस्लाम में निकाह के समय ही पति को कुछ आश्वासनों के साथ भविष्य में विच्छेद (तलाक़) की छूट दी जाती है। यहां तो पति (शौहर) अपनी पत्नी (बीवी) को केवल तीन बार तलाक़ का उच्चारण कर इस संबन्ध से मुक्ति पा सकता है।
हिन्दु विवाह पद्धति का एक विभेधक व धवल पक्ष यह भी है कि इसमें कहीं भी विच्छेद जैसा कोई प्रावधान नहीं है, यही कारण है कि हमारे यहां तलाक़ अथवा Divorce जैसा कोई शब्द ही नहीं है। यद्यपि वैदिक साहित्य में कुछ ऐसी उक्तियां हैं जिन्हें हम विधवा-पुनर्विवाह के अर्थ में ले सकते है, इसके लिये ‘पुनर्भू’ शब्द के माध्यम से पर्याप्त प्रकाश मिलता है किन्तु विवाह-विच्छेद के विषय में कुछ भी प्राप्य नहीं है तथा पौराणिक अथवा धर्मसूत्रों आदि में इसके कोई उदाहरण भी उपलब्ध नहीं हैं। धर्मशास्त्रकारों का सिद्धान्त है कि होम एवं सप्तपदी के उपरान्त विवाह का विच्छेद नहीं हो सकता। मनु (९/१०१) ने लिखा है- "पति-पत्नी की पारस्परिक निष्ठा आमरण चलती जाये, यही पति एवं पत्नी का परम धर्म है।" एक और स्थान पर (९/४६) पर मनु ने कहा है- "न तो विक्रय से और न भाग जाने से पत्नी का पति से छुटकारा हो सकता है।" धर्मशास्त्रकारों का कथन है कि विवाह एक संस्कार है, पत्नीत्व की स्थिति का उद्भव उसी संस्कार से होता है, यदि पति या पत्नी पतित हो जाये तो संस्कार की परिसमाप्ति नहीं होती, यदि पत्नी व्यभिचारिणी हो जाये तो भी वह पत्नी है, और प्रायश्चित कर लेने के उपरान्त उसे विवाह का संस्कार पुन: नहीं करना पड़ता। (याज्ञवल्क्य ३/२५३-२५४)। अत: विवाह-विच्छेद की बात धर्मशास्त्रों एवं हिन्दु समाज में अनकही-अनसुनी सी रही है। स्मृतियों एवं निबन्धों में नारद को छोड़कर पत्नी के द्वारा पति के त्याग की बात नहीं कही गयी है। नारद ने कहा है कि नपुंसक, संन्यासी एवं जातिच्युत पति को पत्नी छोड़ सकती है।
स्त्री प्रशंसा-स्त्रियों के संबन्ध में हमारे ऋषियों ने बहुत आदरसूचक शब्दों का प्रयोग किया है। वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में कहा है- “ स्त्रियों पर ही धर्म एवं अर्थ आश्रित हैं उन्हीं से पुरुष इन्द्रियसुख प्राप्त करते है, ये घर की लक्ष्मी हैं, इनको सदैव सम्मान देना चाहिये”। वराहमिहिर स्त्रीनिन्दकों से पूछते हैं- “ सच बताओ, स्त्रियों में कौनसे दोष हैं जो तुम लोगों में नहीं पाये जाते? पुरुष लोग धृष्टता से स्त्रियों की भर्त्सना करते हैं, वास्तव में स्त्रियॉं पुरुषों की अपेक्षा अधिक गुणों से सम्पन्न होती हैं ” मनु के वचनों को अपने समर्थन में उद्धृत करते हुए वराहमिहिर कहते हैं- “ अपनी मॉं या पत्नी भी स्त्री ही है, पुरुषों की उत्पत्ति उन्हीं से होती है; अरे कृतघ्नी एवं दुष्ट, तुम जब इस प्रकार उनकी भर्त्सना करते हो तो तुम्हें सुख क्योंकर मिलेगा? शास्त्रों के अनुसार दोनो पति-पत्नी पापी हैं यदि वे विवाह के प्रति सच्चे नही, पुरुष लोग शास्त्रों की बहुत कम परवाह करते हैं, किन्तु स्त्रियां बहुत परवाह करती है, अत: स्त्रियां पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं। अकेले में पुरुष स्त्री की चाटुकारिता करते हैं, किन्तु उनके मर जाने पर उनके पास सहानुभूति के शब्द नहीं होते; किन्तु स्त्रियां कृतज्ञता के वश में आकर अपने पति के शवों का आलिंगन करके अग्नि तक में प्रवेश कर जाती हैं।’
Saturday, July 12, 2008
विवाह का विकृत स्वरूप
विवाह का विकृत स्वरूप
आधुनिकता के परिवेश में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराएं जिस द्रुत गति से भारत के शिक्षित व सभ्य कहलाने वाले समाज में विलुप्त होती जा रही हैं, वर्तमान में Marriage या Wedding के नाम से मुखरित होने वाले विवाह इसका सजीव उदाहरण हैं।
भारतीय धर्मशास्त्रों की परम्परा के अनुसार विवाह अथवा परिणय एक संस्कार है, जो कि मनुष्य जीवन की शतायु का द्वितीय पड़ाव अथवा गृहस्थ आश्रम है। ब्रह्मचर्य आश्रम में गुरुकुल में विद्याध्ययन के उपरान्त समावर्तन संस्कार द्वारा स्नातक होकर व्यक्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश के योग्य बनता है तथा विवाह संस्कार द्वारा गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। विवाह में पाणिग्रहण संस्कार देवता और अग्नि के साक्षित्व में करने का विधान है। भारतीय संस्कृति में यह दाम्पत्य सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तर, युग-युगान्तर तक का माना गया है। यह स्पष्ट है कि भारतीय विवाह एक संस्कार है तथा धर्मशास्त्रों में वर्णित सभी संस्कार मानव जीवन को श्रेष्ठता की ओर् ले जाने वाली क्रियाएं हैं। इसी हेतु पर गर्भाधान से अन्त्येष्टि पर्यन्त मनुस्मृति में वर्णित १६ संस्कार अपनी सार्थकता प्रमाणित करते हैं।
विवाह के प्रकार-
ब्राह्म विवाहः दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोग्य वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना `ब्राह्म विवाह' कहलाता है. सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है. आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।
दैव विवाहः किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैव विवाह' कहलाता है।
आर्ष विवाह: कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना `आर्ष विवाह' कहलाता है।
प्रजापत्य विवाहः कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।
गंधर्व विवाहः परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।
असुर विवाहः कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।
राक्षस विवाहः कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' सहलाता है।
पैशाच विवाहः कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।
धर्मशास्त्रों में वर्णित ८ प्रकार के विवाहों में ब्राह्म विवाह सर्वश्रेष्ठ माना गया है व कलियुग में इसी विवाह पद्धति को अपनाने का निर्देश है। ब्राह्म विवाह में अग्नि व देवताओं की साक्षी में मन्त्रोच्चारण सहित पाणिग्रहण व सप्तपदी ही विवाह को पूर्णता प्रदान करते हैं। ब्राह्म विवाह में दहेज अथवा किसी प्रकार के भौतिक पदार्थों की सौदेबाजी का सर्वथा निषेध है। सम्पूर्ण भारत में विवाह की प्राय एक जैसी पद्धति भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की द्योतक है। वर-वधु पक्ष की परस्पर सहमति के उपरान्त दोनों पक्षों की वचनबद्धता, वर पक्ष द्वारा वधु का श्रृंगार (गोद-भराई), विवाह की तिथि का निर्धारण।
वैवाहिक समारोह के रूप में वर-वधु दोनों पक्षों के स्थलों पर मण्डप निर्मिति तथा वधु पक्ष के मण्डप में विवाह-पणिग्रहण सम्पन्न होना। विवाह की समस्त प्रक्रिया में मांगलिक गीत-संगीत आदि से विवाह में उल्लास व उत्साह के संचार का प्रचलन अनादिकाल से ज्ञात है। अपने पुरातन इतिहास में बड़े वैवाहिक समारोहों का प्रचलन केवल राजाओं तक सीमित था, सामान्य प्रजा में नहीं। विवाह संस्कार में अनिवार्यता केवल अग्नि व देव साक्षी में पाणिग्रहण व सप्तपदी की है तथा विवाहोत्तर सम्बन्ध की नित्यता की अपेक्षा है।
भारतीय परम्परा में वैवाहिक सम्बन्धविच्छेद को मान्यता नहीं है, सम्भवत: यही कारण है कि भारतीय शब्दकोश में तलाक़ अथवा Divorce जैसे शब्द नहीं हैं।
विकृतियॉं- विवाह को Marriage अथवा Wedding का स्वरूप दे देने से आधुनिक भारतीय समाज में इसका सुसंस्कृतिक स्वरूप विलुप्त होता जा रहा है व संस्कार के स्थान पर भोंडी विकृतियां जन्म ले रही है जिससे परिवार व समाज में सद्भाव के स्थान पर दुर्भावना, स्वार्थपरकता के साथ-साथ वैवाहिक सम्बन्धों में तनाव व विच्छेद बढ़ रहे हैं, जो किसी भी दृष्टि से भारतीय सामाजिक तानेबाने के लिये स्वस्थ संकेत नहीं है। आधुनिकता के नाम पर नई परम्पराओं ने जन्म लिया है। अंग्रेजी के मोह में वैवाहिक समारोहों का स्वरूप परिवर्तित हो रहा है। नये नामों Engagement, Ring-ceremony, Ladies Sangeet के अन्तर्गत समारोहों का स्वरूप भी बदल गया है। Ring-ceremony लगभग तीन दशकों से प्रारम्भ हुई परम्परा है जो कि सम्भवत: ईसाई विवाह समारोहों की नकल के रूप में अपनाई गई लगती है, क्योंकि भारतीय परम्परा में इसके प्रचलन का उल्लेख नहीं है। स्वयं को आधुनिक दिखाने के लोभ से इस परम्परा का विकास हुआ प्रतीत होता है, किन्तु इसके कारण अपनी मूल परम्परा (गोद-भराई) का लोप हो गया है तथा इस कारण गोद-भराई के समय वर पक्ष की महिलाओं का भविष्य की वधु के प्रति नैसर्गिक स्नेह का स्थान अपनी सम्पन्नता के प्रदर्शन ने ले लिया है। होने वाले वर वधु के समीप होने से वर पक्ष की महिलाओं की व होने वाली वधु की परस्पर आत्मीयता का वह स्वरूप नहीं बन पाता जो गोद भराई के समय अपेक्षित होती है। सामान्यतया Ring-ceremony वधु पक्ष के घर न होकर किसी सार्वजनिक स्थान पर होने से भी दोनो घरों में आत्मीयता के उद्भव का ह्रास ही रहता है।
भारतीय परम्परा में विवाह एक मांगलिक कार्य होने से विवाह को उत्सव का रूप दिया गया व उस उत्सव में दोनों परिवारों के सदस्यों द्वारा मांगलिक गीत संगीत के कायक्रम की प्रथा प्राचीन काल से विद्यमान रही है किन्तु वर्तमान में Ladies Sangeet फ़िल्मी गीतों की धुन पर फिल्मी नायिकाओं की भांति नृत्य का कार्यक्रम होकर हर गया गया है, जिसमें मांगलिकता का सर्वथा अभाव ही रहता है ।
वैवाहिक समारोह में बारात के स्वागतार्थ खड़े वधु पक्ष की महिलाओं व कन्याओं द्वारा स्वागतद्वार पर एक् स्फ़ीत लगा कर बारात के आगमन में बाधा उपस्थित करना तथा वर द्वारा द्वारा उस स्फ़ीत को कटवाना न केवल अमांगलिक है, अपितु अस्वाभाविक भी। स्वागत करते हुए किसी का मार्ग अवरुद्ध करना कहां की समझदारी है?, किन्तु तो भी परिवारों के वरिष्ठजन भी इस विकृति को रोकने का प्रयास नहीं करते, यह वास्तव में चिन्ताजनक है। इसी प्रकार वरमाला के समय वर व वधु पक्ष के लोगों द्वारा ठिठोली के लिये वर व वधु को गोद में उठाकर उसमें बाधा उपस्थित करना अमांगलिक व अशोभनीय है तथा इसके लिये भी वरिष्ठ जन ही अपराधी हैं जो इसे रोकने का प्रयास तक नहीं करते।
विवाह के समय होने वाले यज्ञ के प्रति अश्रद्धा प्रदर्शित करते हुए पुरोहित के कार्य में बाधा उपस्थित करना व पुरोहित को शीघ्रतापूर्वक कार्य के सम्पादन का आग्रह भी अत्यन्त अवॉंछित तथा अशोभनीय अमांगलिक कृत्य हैं जो कि इस संस्कार की पावनता को नष्ट करते हैं।
मेरे अपने अनुभव में मेरे एक अत्यन्त निकट सम्बन्धी के वैवाहिक यज्ञ के समय यज्ञाग्नि प्रज्वल्लित हुई ही नहीं तथा मेरे बार बार कहने के अनन्तर भी सारा कार्य अप्रज्ज्वलित अग्नि के समक्ष ही सम्पन्न हो गया। मुझे खेद है यह विवाह विच्छेद में परिवर्तित हो रहा है।
एक और निकट सम्बन्धी के वैवाहिक समारोह में यज्ञ व सप्तपदी के स्थल पर मण्डप सज्जा नहीं की गई थी अपितु यह कार्य भवन की छत पर् खुले आकाश के नीचे सम्पन्न हुआ। यह विवाह भी विच्छेद की और बढ़ता प्रतीत हो रहा है। हम सभी हिदुओं का यह दायित्व है कि हम अपनी स्वस्थ परम्पराओं के प्रति संवेदनशील व उनके रक्षण के प्रति उत्तरदायी बनें ।
डॉ. जय प्रकाश गुप्त ।
+91-9315510425




.jpg)
.jpg)
.jpg)





